इक गमगीन सूखी आस

कौस्ता हू उस आस को
निगल गयी जो साँस को

अपना सब उस पर लूटाया
पर शायद उसे समझ ना पाया

सच वो आस मुझमे दबी थी
पर वो शायद उससे भी दिखी थी

दूर जा रहा था मुझसे
पर उसके लिए दिल खफा ना था मुझसे

इक दिन वो कुछ कहते-कहते रह गया
और क़हकहो मे दबी उसकी आवाज़ अपनी जगह पा गया

असलियत मे एक रुकी ट्रॉली पर अटका
उसके पँखो और आसमा को शायद ये खटका

पता चला निचली चोटी पर
उजले बादलो के बीच
पँखो वाले साथियो के साथ
वो उड़ने को आमदा था

एक लम्बी साथी रस्सी के साथ
जिसका दूसरा छोर मेरे करीब था

दूर कही खाई मे
संयोग से इक गुलाब था
जिसके कांटो पर नमकीन पानी पड़ा था
इक दबी आस अपने से कब्र को मिलने

भीड़ के साथ बेमन से चल पड़ा था
गिरकर भी उससे ना मिल पा रहा था

जमाना भारी हाथ  से कंधे को दबाते रहे
और परिवार इक दूसरे को झूठी ढाढ़स बढ़ाते रहे

पर मैं आंसू जाया करूँगा  नही
और इस बेमौसमी फुहारो को और नमकीन बनूंगा नही

यह इक नयी सूखी आस है मेरी
और खुदा से आख़िरी गमगीन गुज़ारिश है मेरी.

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