Thithi: Characters stay

अभी अभी तिथि देखि,कन्नड़ भाषा में बनी बहुत ही बेहतरीन फिल्म है.अच्छा लगता है लोकल लैंग्वेज की फिल्मों को देख कर वो भी बिना रीमेक की , नहीं तो अधिकतर रीमेक में तो जान ही निकल जाती है.वैसे ही जैसे की हिंदी हर्टलैंड का कोई आदमी जब इंग्लिश में अपनी आत्मा डालना चाहे.धन्य हो नेटलिक्स , प्राइम और मूबी जैसी इन्टरनेट सेवाओं का की मुझ जैसे मूवी के चाहने वाले को सस्ते सब्सक्रिप्शन पे इतना कलेक्शन देखने को मिल जाता है.

thithi

तिथि की स्टार्टिंग में ही आनंद आ जाता है जब सेंचुरी गौडा फर्स्ट सीने में बस सब आते जाते लोगो पे तान मारते रहते है.वैसे ही तो होते है गाँव के बूढ़े लोग, फुल लाइसेंस मिल जाता है बक बक करने का और फिल्म जमीनी इसीलिए भी लगती है ये क्योंकि अभी इन कैरक्टर्स के समाज में कम्पटीशन नहीं आयी है अपने गाँव को छोड़ने की,आ जायेगी शायद 5 -10 साल के बाद.इस मूवी के करैक्टर जैसा ही महसूस होता था जब मैं बचपन में अपने नानी घर जाया करता था.तब लगता था खा जी रहे है ये लोग.दुंनिया बहुत बड़ी है इन्हें कुछ पता भी है की नहीं. सब चीजें बुरी लगती थी जाना पसंद नहीं था पर कही ना कही मैं भी उस परिवेश का अदना सा हिस्सा हु बस गहरा सम्बन्ध स्थापित नहीं हो पाता शायद क्योंकि आगे बढ़ने की सबको पीछे छोड़ने की लालसा में थोड़ा आगे निकल आया वो गहरा प्यार नहीं बन पाया.कितने खुश है सारे कैरक्टर्स अपनी छोटी सी दुनिया में.एक परदादा है जो शानदार सेंचुरी खेल के जा चूका है, दादा है जो सब चीजों से ऊपर उठ चूका है एक बेटा है जो थोड़ा सोच रहा है पोता है जो यौवनावस्था में प्रवेश कर रहा है, मदमस्त दोस्तों में गुम.कटाक्ष है जब वो कार्ड बाटने जाता है तो लोग उससे पहली बार मिल रहे होते है बचपन के बाद. वो भी शायद रेस के तैयार हो रहा है या फिर उसकी बच्चे तो पक्के से तैयार होंगे उस गाँव से निकलने के लिए.एक बंजारा लड़की है जो भेड़ों के साथ या खुद के सात भटक रही है पर वो भी युवा हो रही है .तारीफ़ उसे भी पसंद है और विश्वास भी है की अपना विश्वास जिसको दे रही हु वो उससे ढूंढेगा और शादी करेगा.सब अपनी ही दुंनिया में मस्त है पर सब मानवीय है. शिवाय सेंचुरी gawda की.हो सकता है वो भी हो ज्यादा असको दिखाया नहीं गया.गुडप्पा जो मस्त है सारे पैसे बाटने से पहले सोचता नहीं और लेने वालो में एक है जो साफ़ मना कर देता है.गुडप्पा का बेटा है जो पिता को मार भी सकता था पर उससे ट्रिप पे भेजता है और गुडप्पा भेड़ों में चिपटा है अपनी बात से ना मुकरने के लिए.सबसे जवान लड़का या परपोता कहे तोह उससे शर्म है की उसके कारण भेड़ वाले लोग जा रहे है .कह नहीं सकते की उसने सच्चा प्यार किया उस लड़की से या बस जवानी में खोया हुआ था. सबकी उलझी हुई कहानियां है कोई निश्चित अंत नहीं है सब ग्रे करैक्टर है और सब वापस मिलते भी है तो तिथि के रोज.और अंत जो बस सोचने को मजबूर करती है की आगे क्या हुआ होगा.पर डायरेक्टर को क्या वो तोह मस्त गुडप्पा की तरह अलाव की भीनी रौशनी में चल दिए बैकग्राउंड में तिथि के संगीत के साथ की आप सोच लो की किसने क्या कहा क्या किया कितना सच कहा और कितना अच्छा या बुरा आगे हुआ.

अच्छा लगा , करैक्टर साथ रह गए जाते जाते.

-धन्यवाद राम रेड्डी.